ओस की बूंदें और मैं! — Nitish

अश्रुधारा से तुम क्यूँ अकारण, इस ह्रदय को विह्वल करते हो? मुझे पुन:आगमन करना ही हैं, मन क्यूं करूणा से भरते हो? समाज के व्यर्थ प्रलापों से क्या प्रेम तुम्हारा पतित हुआ? कितनी सुंदर तो बरखा थी, मन क्यूं न तुम्हारा हरित हुआ? तुम्हारे नंगे पैरों के स्पर्श से मैं (ओस की बूंद) मारा गया […]

via ओस की बूंदें और मैं! — Nitish

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अमर चेतना समाचार पत्र

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